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आग लगी है कोख में मेरी
इतनी बेचैनी है कि लगता है शायद
दो जुड़वाँ नज्में पैदा होंगी मुझ में से।
बस नाम को जुड़वाँ नज्में….
न नैन नक्श मिलते होंगे न ही तासीर इनकी
बस एक वक़्त पर थोडा इधर उधर जन्मी दो नज्में
एक झुलसते हुए ख़्वाबों की नज़्म
तामीर होने को मचलते ख़्वाबों की नज़्म होगी
छटपटा के रोती हुई निकलेगी जब ये नज़्म मेरी कोख से तो
अपने वजूद का एहसास दुनिया को करा देगी!
दूसरी नज़्म होगी एक बिखरते रब्त की
जो कभी दम तोड़ता हुआ दिखता है तो कभी
एक खायी में गिरते इंसान की तरह जो
एक टहनी के सहारे जी जान से जान बचाने को लगा हो
ये नज़्म जिसके आने का इन्तजार मुझे कुछ ज्यादा है!
इसी से मुझे इस रब्त की किस्मत का कुछ पता चले शायद ….
बस एक डर है मुझे…
जन्म लेती ये नज्में आते आते या आते ही दम न तोड़ दें कहीं
दोनों का हो जाना और जी जाना,
बस इतना ही चाहती हूँ मैं हर माँ की तरह
और ये भी दुआ करती हूँ कि हर जन्मे बच्चे की तरह
ये नज्में भी अपने होने से एक नयी उम्मीद, नयी खुशियाँ लायें
और इस आग को भुझा दें.… अगली नज़्म के होने तक.…
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