एक मौसमी ख़याल है
अक्सर ज़हन में आता है
मौसम बदलने पर जैसे
जुखाम या बुखार सा आता है
चार पांच दिन दिल ओ दिमाग में
फितूर बन के फिरता है
जुनूनी सा कभी तो कभी इंकलाबी सा लगता है
ख्वाब में मिली कई अनजानी जानी पहचानी
शख्सियतों का फितूरी ख़याल है
कौन मिला कहाँ मिला कैसे क्या हुआ
बस धूल के बवंडर उडाता हुआ ख़याल है
मैं भी सब्र से इसके बीत जाने का इंतज़ार करता हूँ
जुखाम से आता है तो ज़ुखान से जाता भी रहेगा और चला भी जाता है
कोई तवज्जो नहीं देना चाहता मैं इस ख़याल के बवंडर को
और न ही कुछ करना चाहता हूँ मैं इस के बारे में
ये यूं ही आता जाता रहता है तो एक सुकून सा मिलता रहता है
वो जैसे उन बक्सों को देख कर मिलता है
जिन्हें कभी खोला नहीं और न ही कभी खोलेंगे।
बस वो हैं घर के किसी कोने में यही एहसास काफी है
और ये मौसमी ख़याल भी इसी तरह
फ़क़त एक ख़याल ही रहे तो अच्छा है
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