जाने किस मैराथन में दौड़ रही है ये
बस चलती ही जा रही है…
कभी हांफती हुई सी तो कभी
धीमे धीमे खुद को धकेलती हुई सी
कभी रुक कर घडी दो घडी दम ले लेती है तो
फिर से सरपट दौड़ने लगी है बेतहाशा ये
न जाने कहाँ है इसकी फिनिशिंग लाइन
जाने कहाँ जाके रुकेगी ये बरसात
के बस जैसे किसी मैराथन में दौड़ रही है ये
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