अलफ़ाज़ ज़ाया करने की आदत नहीं मुझे
जो सुन सके दिल से और मेरी नियत समझ सके,
बस उसी पे खर्च करता हूँ मैं लफ्ज़ अपने।
इस बोलने सुनने समझने के कारोबार के दांव पेच
बड़े ही उलझा देने वाले हैं…
डरता हूँ कि कहीं गलत जगह इनका इस्तेमाल न कर बैठूं
फिर पूरा हिसाब किताब ही गड़बड़ा जाएगा!
जिस पर भरोसा हो के इनकी कीमत जान लेगा
और इनका मोल समझ लेगा,
बस उसी के लिए हैं मेरे लफ्ज़।
वरना दुनिया में कम सिफत का सामान भी बतेरा है।
जिसे जो भाये बे रूह ओ मानी ... खरीद ले!
मेरे बस का नहीं ये खोटा सौदा करना …
क्यूंकि अलफ़ाज़ जाया करने की आदत नहीं मुझे!
1 comment:
Bahot khoob.
Dil ko chu gai
Savitha.
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