Wednesday, May 15, 2013

दवा की पुडिया



सांस यूँ अटकी है सीने में जैसे 
किसी बासी कड़ी रोटी का कोर अटका हो।
न हिचकी आती है न ये हलक़ से नीचे ही उतरता है।
पीठ में गाँठ सा दर्द होता है और 
कानों में गुम्मा सा लगा रहता है 
धड़कन तो  महसूस ही नहीं होती है अब 
जिंदा हूँ तो शायद चल ही रही होगी 
दिन में कई बार हांफ कर दम भरना पड़ता  है 
जिस्म में ऑक्सीजन की कमी रहती है
शायद इसीलिए सर फटा फटा सा रहता है 
मर्ज़ क्या है दावा क्या है ये सब मुझे पता है 
तुम्हारे न होने से बस इतना पता चला है के 
तुम लाइफ सपोर्ट सिस्टम हो मेरे 
कभी न ख़त्म होने वाली दवा की पुडिया हो 
और वो पुडिया की डोस 
तुम्हारी आवाज़ ओ शक्ल ओ एहसास की डोस 
आजकल कम मिलती है तुम्हारे मरीज़ को 


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