Tuesday, February 26, 2013

सजन रे बैरी


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सजन रे बैरी 
तू काहे न सुने मोरे जियरा की बतियाँ 
सजन रे बैरी 
तू काहे न पढ़े कारे बदरा की पतियाँ 
सजन रे बैरी 

दिन चढ़े ही होवे साँझ नयन में 
तुमरे दरस जो न होवें रे… 
दिन भर जलूं मैं बिरहा की अग्नि में 
जल के बुझावे न मैं बुझूँ रे...
पियाजी कब आवोगे, कब आवोगे 
गर लगावोगे, लगावोगे 
हो… कब तक बुहारूं तुमरी बाट ओ रसिया 
सजन रे बैरी 
तू काहे न सुने मोरे जियरा की बतिया 
सजन रे बैरी 


म्मम्मम.. लुक चुप तुमरे नैन पढूं मैं 
नींद भरे तू जब पलकन में 
लटकी सूरतिया तुमरी पग मोरा रोके 
लिपटी ही जावे मोरी धड़कन में 
सजनी मैं का बोलूं, कैसे बोलूं 
जियरा के भेद कैसे खोलूं 
उलझा पड़ा हूँ अपनी सोचन मैं, हाँ 
सजनी रे हमरी 
तू काहे न माने तू ही हमरी है दुनिया  
सजनी रे हमरी 
तू काहे न पढ़े मोरे जियरा की बतियाँ

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