मैं रूह नहीं मैं रूप नहीं
मैं इंसान नहीं शैतान नहीं
मेरा कोई धर्म नहीं ईमान नहीं
कोई नाम नहीं पहचान नहीं
मैं भीड़ का बस इक हिस्सा हूँ
इक भूला बिसरा किस्सा हूँ
"हम पेट की मारी जनता हैं"
जो कहता है सच कहता है
दो रोटी का आसरा दे दे जो
वो सच में अच्छा नेता है
लेकिन ऐसा होता ही कब है
बोल के मोल तो बेमतलब हैं
आसरे तो झूठे मूठे होते हैं
वादे बस नाम के होते हैं
मैं वोट से पहले अनमोल बशर हूँ
और उसके बाद खामोश शजर हूँ
किसी के भी इशारे पर कट कर मैं
संसद में कागज़ बन घिसता हूँ
मेरा कोई धर्म नहीं ईमान नहीं
कोई नाम नहीं पहचान नहीं
मैं भीड़ का बस इक हिस्सा हूँ
इक भूला बिसरा किस्सा हूँ
मैं भूखा नंगा बच्चा हूँ जो
तेरी गाडी थपथपाता है
और चल भक तेरे कहने पर मालिक
चल भक ही हो जाता है
मैं रुपये के पीछे बन्दर बन जाऊं
तेरी उंगली पर नाचूं गाऊँ
कोई चार पैसे हाथ में धर दे तो
किसी का भी मैं खून पी जाऊं
अपना घर चलाने को मैं
बीहड़ का बागी भी बन जाऊँगा
बस सीधे रस्ते चलने को न कहना
वरना मैं मुंह की खाऊंगा
इमानदारी की खाने जाऊं तो
खुद मटन बिरयानी बन जाऊँगा
एक दिन किसी सड़क के कोने में
सड़ता हुआ पाया जाऊँगा
कुछ करूं मैं या न करूं यहाँ
मैं हरदम ही तो पिसता हूँ
मेरा कोई धर्म नहीं ईमान नहीं
कोई नाम नहीं पहचान नहीं
मैं भीड़ का बस इक हिस्सा हूँ
इक भूला बिसरा किस्सा हूँ
उल्टा सीधा जुगाड़ कर करके मैं
दो चार पैसे कमाता हूँ
एक वक़्त खा दो वक़्त खिला के
थक कर के सो जाता हूँ
पायी पायी जोड़ जोड़ के
जब मैं सिनेमा देखने जाता हूँ
जो खुद न कर सका मैं वो सब
किसी को करते देखने जाता हूँ
फिर खुश हो हो कर चिल्ला कर
मैं सीटी खूब बजाता हूँ
मैं जानता हूँ कि हीरो सच में
कोई हो नहीं सकता
इतनी पॉवर के रहते कोई
अच्छा तो रह ही नहीं सकता
जो पॉवर में हैं बैठे आजकल
वो कितने अच्छे सच्चे हैं
जो सचमुच के हीरो खोजने चले हैं
वो अकल के कितने कच्चे हैं
उन जैसा मैं कम अकल तो नहीं
हालांकि बेवकूफ मैं दिखता हूँ
मेरा कोई धर्म-ओ-ईमान नहीं
कोई नाम नहीं पहचान नहीं
मैं भीड़ का बस इक हिस्सा हूँ
इक भूला बिसरा किस्सा हूँ
क्यूँ देखूं पीपली लाइव और शंघाई मैं
क्यों अपना फ्राईडे ब्लेक करूं
क्यों राजनीति के झोलम झोल देखूं मैं
क्यूँ मैं वक़्त अपना बर्बाद करूं
जो रोज़ लाइव ही मैं देखा करता हूँ
उसे क्यूँ परदे पर सजा धजा देखूं मैं
क्यों न देखूं मैं राओडी राठोर
क्यों न हुड हुड दबंग करूं मैं
क्यों न मुन्नी शीला के ठुमकों पर
सिनेमा हाल में शोर करूं मैं
मुझ पर जो हर वक़्त ही बीती है
उसकी ही याद भुलाने को
पल दो पल मैं फिल्में देखूं
ऐ सी की आबो हवा खाने को
जब असल में अन्ना के नक्शे कदम पर
मैं सीना तान के चलता हूँ
लाचारी भ्रष्टाचार से लड़ने को जब
अपने घर से निकलता हूँ
ज़िल्लत गाली आंसू गैस और जाने कितने ही डंडे
खा खा के घर को वापिस मैं आता हूँ
और फिर दूसरे दिन अखबार में
मैं खुद एक खबर बन जाता हूँ
मुझपर नमक मसाले निम्बू निचोड़ कर
खाते हैं पोवेरफ़ुल लोग नोंच नोंच कर
मेरी बीती का चखना बना कर
सजाते हैं अपने खाने की प्लेट पर
जब किस्सा सारा ऐसा ही हैं
तो क्यूँ हर पल मैं रोऊँ बैठ कर
और क्यूँ रिएलिटी देखूं परदे पर
क्यूँ न कॉमेडी सर्कस देखूं मैं
कपिल भारती कृष्णा के संग हंस लूं मैं
क्यूँ न चिकनी चमेली पे नाचूँ मैं
पल दो पल ही सही ऐसा करने से
मैं कुछ पल तो चैन से जीता हूँ
मेरा कोई धर्म नहीं ईमान नहीं
कोई नाम नहीं पहचान नहीं
मैं भीड़ का बस इक हिस्सा हूँ
इक भूला बिसरा किस्सा हूँ
जो ए सी गाड़ी में घुमते होंगे
और ए सी बंगलों में रहते होंगे
जिनके बच्चे परदेस में पढ़ते होंगे
जो वीकेंड में माल में घुमते होंगे
बस वो ही ये फिल्में देखते होंगे
मैं उनके बच्चों संग खेलूँ तो
उनके बच्चे गंदे हो जाते हैं
उन्हीं बच्चों के जन्मदिन पर
वो मुझे सोफिस्टीकेटीड भीख दे जाते हैं
सर पे छत नहीं है मेरी और
फूटपाथ पे सोने से डरता हूँ
क्यूंकि उन्हीं लोगों की बी एम् डब्लू के नीचे
मैं दिन दिहाड़े बीच रात में आके मरता हूँ
दिन चढ़े मैं उन्हीं लोगों के बंगलों में
बिंदास उनके बर्तन घिसता हूँ
मेरा कोई धर्म नहीं ईमान नहीं
कोई नाम नहीं पहचान नहीं
मैं भीड़ का बस इक हिस्सा हूँ
इक भूला बिसरा किस्सा हूँ

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