मैं जिस बस में बैठी दफ्तर को जा रही थी
उस बस के साथ साथ एक आदमी भाग रहा था
अपना देस होता तो लगता की कोई फूल वाला
या कुछ बेचने वाला बस के कस्टमरों कों लुभाने
की कोशिश कर रहा है लेकिन.. ये मेरा देस नहीं
ये तो परदेस है.. यहाँ न तो बस बीच राह किसी को
उतारती है और न ही किसी को बीच राह चढ़ाती है
फिर देखा पिछले स्टॉप पे उसने बस गवा दी थी और
इसी चाह में की अगले स्टॉप मिल जाए भाग रहा था
मैं कभी घबराती तो कभी उम्मीद से देखती थी उसे
मानो कोई रेस चल रही हो और आखिरी मुकाम पे हो
लाल बत्ती पे बस रुकी तो थोड़ी जान में जान आयी मेरे
शायद अगले बस स्टॉप पे उसको बस मिल जायेगी
वो भी अगले स्टॉप की ओर लगभग पहुंची ही चुका था
फिर देखा नहीं नहीं बस पहुँचने को ही है और
वो चल रहा है अब तक बस देखते ही वो फिर से
दौड़ने लगा हांफने लगा. सांस चढ़ रही थी उसको शायद..
इन दो बस स्टॉप में लगभग १ किलोंमीटर का फासला था..
वो उससे भी पिछले स्टॉप से भाग रहा था .. हाथ में सामान लिए
बस वाले ने तरस दिखाया और उसके हाथ दिखाने पे चंद पल रुक गया
वो भागते भागते बस में चढ़ा और मुझे लगा मानो
मेरा पसंदीदा रेसर जीत गया
ख़ुशी से उछल कर ताली बजाने को हाथ ज्यूँ ही उठे तो होश आया
ये कोई रेसकोर्स नहीं दिन दिहाड़े बस में हूँ...
बड़ी सी मुस्कान लिए मेरे जिस्म में हवा दो गुना ज्यादा भर आई
बड़े ही अरमां से मैंने पर्स में रक्खी पानी की बोतल निकाली
हांफते मेरे फेवरिट खिलाड़ी को थोडा पानी पिला दूं..
मेरे अन्दर का बच्चा मचल रहा था कि उसका औटोग्राफ मैं ले लूं..
फिर मेरे ज़हन के बड़े ने हलक खंगाला और उस बच्चे को टोक दिया
शादी शुदा हो तुम अब और वो कोई पराया मर्द है न..
बिन जाने पहचाने उसको बिन मांगे पानी पिलाया तो
दुनिया क्या कहेगा.. वो क्या सोचेगा.. पीछे ही पड़ गया तो क्या करोगी तुम?
मन मसोस कर हाथ मरोड़ कर बोतल वापिस रख ली मैंने
गर्व जिस बड़े होने का हर वक़्त रहता था मुझको
आज उसे बड़े होने पर अफ़सोस हो रहा था मुझको...
दिल से अभी बच्ची हूँ मैं.. मन तो वही सब करने का करता है
पर मेरे ज़हन का बड़ा मुझे हर वक़्त टोकता रहता है..

1 comment:
While reading it felt like a two minute refreshing break, so I extended it to five. Awesome? :)
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