तुम्हें सुन कर खुद को बेमानी पाती हूँ मैं
मेरे लफ्ज़-ओ-नज़्म-ओ-ख़याल-ओ-मिसरे
वो सब तो अभी जन्मे जाने के भी काबिल नहीं लगते
जो तुम अपनी गहराई सी भरी हुई आवाज़ में कह जाते हो न
वो सुन कर आह निकलती है और
अल्लाह! कहे बिना रहा नहीं जाता
मुझ जैसे कहने वालों के ख्यालों पे
यूँ नाज़ुकी से फुट्टे मारते हो तुम
कि फ़क़त दर्द होता है आवाज़ नहीं आती उसकी
कभी तुमको सुनकर सोचती हूँ कि लिखना ही छोड़ दूं मैं
मैं लफ़्ज़ों के साथ अब इतनी नाइंसाफी न कर पाउंगी
फिर सोचती हूँ कि क्यूँ छोडूं?
क्यूँ तुम्हारी मुझपर की मेहनत को ज़ाया करूं..
बचपन में मास्टर जी हाथ पे फुट्टा मार मार कर
मेरी लिखाई सुधारा करते थे
तुम लफ़्ज़ों से ही वो काम कर दिया करते हो
बात असर की है तो वो होता ही है मुझपर
तो लो लिख दी मैंने फिर कुछ अल्ल्हड़ सी नज़्म
उम्मीद है कि कुछ नहीं तो तुम्हारे लफ़्ज़ों के फुट्टे
फिर से खाने को मिल जायेंगे..
ये भी कोई कम लालच नहीं मेरे लिए..
इसी बहाने मुझे मेरे होने के कुछ तो मानी मिलेंगे...

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