मेरे अन्दर की ग़ज़लें मर रही हैं
और नज्में उन्हें घेरे खामोशी से सुबक रही हैं
तुम्हारी आवाज़ की साँसों से जिन्हें ज़िन्दगी मिलती थी
अब वो आवाज़ ही नहीं रही और तुम भी नहीं रहे
हैरान हूँ मैं कि सोचती हूँ कि ये मातम किसका है
तुम्हारे जाने का या इनके मरने का
जिसका भी हो..
कोई मर तो रहा है और कोई मर गया है...
वो कहते हैं बौछार थे तुम
हाँ सच ही होगा
मेरी ग़ज़लों कों और नज्मो को
भिगो के चल पड़े तुम
नज्में बच गयी हैं आधी अधूरी सी
और मेरी ग़ज़लें भीगी हुई सी
सुन्न हो गयी हैं... ज़र्द पड़ गयी हैं
शायद आखिरी सासें गिन रही हैं वो
तभी तो सब नज्में उन्हें घरे सुबक रही हैं
मुझसे भी अब सांस ली नहीं जाती
हाय उनके बारे में सोच के
मेरा ही तो हिस्सा हैं वो
तुम बिन मुझमें कुछ तो मर रहा है
और मुझमें कुछ तो मर गया है...
न तो रब्त था तुमसे
और न ही कुछ
लेकिन तुम्हारे जाने से
मुझमें कुछ तो घट गया है
मुझमें कुछ तो मर रहा है
मेरी ग़ज़लें..
आखिरी सासें गिन रही हैं
कोशिश पूरी है कि बचा सकूं उन्हें
तुम्हारे नाम का वास्ता देकर
कहूँगी जी लें.. तुम्हारे लिए ही सही.
उनका सपना था कि तुम उन्हें
अपने लब पर रख कर बोलो
तुम्हारे साथ वो खाब भी फना हो गया
खैर..
कहते हैं कि मरने के बाद सब एक ही जगह जाते हैं
मेरी ग़ज़लें तुम्हारे पास ही आ रही हैं..
मिलें तुम्हें तो कम से कम ..
उन्हें सुन लेना..
उनकी रूह को गति मिल जायेगी..
1 comment:
कोई मर तो रहा है और कोई मर गया है...
hmm
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