मुद्दत हुई कुछ मुंह जुबानी कहे..
कुछ उला कहे कुछ सानी कहे
कुछ लिख कर फाड़े हुए लफ़्ज़ों को
कुछ कह कर ख़ारिज किये मिसरों को
कुछ सुनने में हिचके हुए
कुछ तपाक से उगले हुए
मैं अक्सर ख़ारिज ही करता हूँ
कुछ भी कहने से डरता हूँ
लफ्ज़ नजाने कितने हैं लेकिन
मुद्दत हुई कुछ बा मानी कहे
कुछ उला कहे कुछ सानी कहे

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