Thursday, February 9, 2012

झेंप






तुम्हारी जुल्फों में से जो 
नन्हे बाल इधर उधर से 
निकलके झांकते रहते हैं न 
यूँ लगता है जैसे कि
किसी बेल में से कुछ
नयी कोपलें फूट पड़ी हों 
और अपनी जगह ढूंढ रही हों|
जब बाल सवारने के बहाने 
तुम  उन नन्हे बालों कों 
बाकी जुल्फों में मिलाने
और छुपाने कि कोशिश करती हो
बस उसी अदा पर प्यार आता है
धूप  में जब उन नन्हे बालों पर 
कोई किरण पड़ती है तो 
मानो कि जुल्फों का सिताँ
सोने सा रौशन हो गया हो
तुम झेंपती हो उन नन्हे बालों से..लेकिन 
मेरी नज़र से देखो गर जान-ए-जाँ
तो तुम्हारे होने का हर इक कतरा
नायाब-ओ-लाजवाब है..
तुम्हारी पलकों और आँखों के किनारे
सुबह सुबह जो मासूम से ख़्वाबों के
छिलके पड़े मिलते हैं न 
जब उबासी लेकर अंगडाई लेती हो तो
कसम से इश्क हो जाता है उनसे भी...
अपने होने की कतरनों से यूँ झेंपना करो जान
तुम्हारी तरह वो सब भी मुझको
बेहद खूबसूरत लगते हैं.. सच्ची..

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