Thursday, December 29, 2011

दर्श



तू क्या कहता है मैं क्या जानूं.. 
मुझे तो बस तेरी छवि दिखती है
तू रोये तो सिसकी दिखती हैं 
हंस दे तो ख़ुशी दिखती हैं 
तेरे नन्हे हाथों पैरों में मुझको 
मेरी सारी दुनिया दिखती है 

तू रीड रीड के चलता है तो 
सफ़र सुहाना लगता है 
मंजिल तक पहुंचूं न पहुंचूं 
राह भी मुझको हसीं दिखती है 

तेरी अजीब अजीब आवाजों में
सब बेमानी लफ्ज़ मिलते हैं 
लेकिन जब जब उनको सुनती हूँ
मेरी नज्में बेमानी दिखती है

तुझको ये सब क्या कहूँ मैं 
तू कहाँ ये सब समझेगा 
हाँ इक दिन तो समझेगा सब कुछ 
इतनी उम्मीद तो दिखती है ..

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