Wednesday, November 2, 2011

एहसास




घुटता जाता है मेरा मुझसे ही जो रब्त था
मुझी में ये मर रहा है जैसे..
इक खलल पे चीख उठता है ये
ज़रा सी आहट पर बौखला जाता है
कुछ तो पेंडुलम जैसा हिलता रहता है
जिस्म मेरा क्या से क्या हो गया 
सर क्यों झन्ना जाता है 
अश्क हर क्यों धुंआ हो गया
बड़ी मनहूसियत सी छाई है
कुछ मर रहा हो जैसे..
कुछ पता हो तो कुछ कर सकूं मैं
कुछ न पता हो तो कुछ करूँ मैं कैसे..
हर वक़्त बस इक डर सा है अब
हर वक़्त भरी पड़ता हा
धड़कन जैसे टिक टिक करती 
कुछ कम कुछ बढता जाता है अब
सन्नाटे की इतनी आवाज़!
सोचा न था हो सकती है..
ख़ामोशी से चीखने की
सर्गिशी भी जान ले सकती हैं..
ये शोक सभा सहें नहीं होती अब
बस करो इसे बंद करो
एहसासों के मरने का
इतना भी कोई ग़म नहीं करते...
बस उथला कर दो अब 
रहेम करो.. गति दे दो इन एहसासों कों
सुकून से जो जी न सके...
उन्हें सुकून से मरने तो दो...

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