Wednesday, September 21, 2011

तलाश

                                 


आसमाँ का क्या पता
कब ये घिर आये कहाँ...
साहिलों की क्या खबर..
कब उमड़ आयें यहाँ..
ये ज़मी ठहरी हुई.. 
जाने कब ये हिल पड़े..
ये हवा मद्धम चले
जाने कब तूफ़ान बने..
मैं तो चला चलूँ 
इन लहरों की तरह 
मैं तो उड़ा फिरूं
बादलों की तरह
कभी मैं धूल हूँ
तो कभी फूल हूँ..
जहां ये ले चले
वहीँ मैं चल पड़ा...


चाँद की छन्नी से मैं
रात से तारे चुनुं..
जुगनुओं के साथ में
खोये किस्से ढूंढ लूं ..
कायनात है क्या बला..
क्या पता मैं जान लूं..
ये जुगनू  तारे चाँद
जो ढूंढें रात में
सारे जहां के 
सोने के बाद में..
कोई तो दास्ताँ
होगी यहीं कहीं
कोई तो बात होगी
उसमें छुपी ही..


तेरे तलवों के तले..
राज़ गहरे हैं दबे...
इक कदम ये जहां पड़े ..
उल्का इक वहाँ गिरे..
अंगूठे की ठोकरों
से ये ज़मीं हिले 
अपने ही आपने 
ये घूमती फिरे 
तूने छुआ है जो
मुझे यूँ हाथ से
सूरज ये जला गया
तप गया आग से
तेरी नज़र से जो
बही थी ओंस वो 
उसे ही रोकने
 को साहिल बन गया .
तुझे ही ओढने 
को आसमाँ बना 
तेरी ही सांस है
यूँ मेरे चारसूं 
फिर भी तेरा पता 
 मैं ढूँढने चला .... कहाँ... 


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