तुम बड़े हो गए हो...
जात पात ऊंच नीच
इन सब से ऊपर उठ गए हो..
अब तुमको आज में जीने की चाह है
आने वाले कल ही परवाह है
आस पास के लोगों की
ज़मीन की फलक की
फिक्र है तुमको अब
उनके हालातों से
फर्क पड़ने लगा है तुम्हें
जो खुद भुगता है तुमने
और तुम्हारी पुश्तों ने
इन ६४ सालों में
उनसे सबक ले रहे हो तुम
गलतियाँ अब कम दोहराते हो
नयी गलतियाँ करते हो
सोच कर या अनजाने में
ये आने वाला कल ही बता पायेगा
१ बिलियन लोग हैं यहाँ
सब घुलने मिलने लगे हैं
कुछ सुकून महसूस होता होगा न?
जिन दिनों ये सब एक दूसरे के
खून के प्यासे थे
ये आज फकत सपना लगता था न?
जैसे दहशत से इजाद पाना
आज एक सपना लगता है?
हाँ गरीबी की मनहूसियत
वो अब भी है..क्या पता ये सपना
बस सपना ही बन कर रह जाए
तुमने एक एक कर कर
इन करोड़ पत्तों टहनियों से
एक मुकम्मल सा
पेड़ बनाना चाह था
जिसमें फल भी आते
६४ बरस से इसी काम में लगे हो तुम
कुछ पत्ते बिखरे गए..
कुछ दरारें आई तने में
लेकिन काम भी जारी है ..
कितना गिरे कितना उठे
कितना भूले कितना सीखे
तुमसे ज्यादा कोई नहीं जानता
हाँ मगर ए वतन मेरे!
इतना ज़रूरर पता है फक्र से
कि तुम बड़े हो गए हो!

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