Saturday, August 13, 2011

रब्त



हर पल इक नया रेशा जमा हुआ
और हर पल उसको गूंथा हैं हमने
हर रंग में डुबोया उसको और फिर  
हर लम्हा उसको पिरोया हमने
कभी यूँ ही अनबन की तो 
कभी बस ऐवें ही मान गए 
कभी ढोल बजाये बातों के तो 
कभी बिन बोले सब जान गए
इक जो तुमसे रब्त है मेरा
नब्ज़ में हर पल रहता है 
ऐसे वैसे दिनों में अक्सर
वो दिल बनकर धड़कता है
जो इक धागा बनाया था इक दिन
पापा की गोद में चढ़ कर कहा था
ये मैंने बनाया है उसके लिए
प्यार के बोसे की मोहर लगा कर
उसमें अपनी दुआएं भर दी थी 
शायद वही डोर है जो अब तक
हमको जोड़ के रहती है और
कभी न टूटती है और न ही उसमें
कभी कोई भी बल पड़ता है...
क्या वो मेरे तुम्हरा उन्स था या
दुआ थी जो उस गोद ने दी थी
वो क्या है जो अभी है ..
वो क्या है जो हमेशा रहेगा...
यकीन है उसके होने का 
लेकिन.. पता नहीं वो क्या है और क्यूँ है..
बस है.. इतना काफी है..

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