हर पल इक नया रेशा जमा हुआ
और हर पल उसको गूंथा हैं हमने
हर रंग में डुबोया उसको और फिर
हर लम्हा उसको पिरोया हमने
कभी यूँ ही अनबन की तो
कभी बस ऐवें ही मान गए
कभी ढोल बजाये बातों के तो
कभी बिन बोले सब जान गए
इक जो तुमसे रब्त है मेरा
नब्ज़ में हर पल रहता है
ऐसे वैसे दिनों में अक्सर
वो दिल बनकर धड़कता है
जो इक धागा बनाया था इक दिन
पापा की गोद में चढ़ कर कहा था
ये मैंने बनाया है उसके लिए
प्यार के बोसे की मोहर लगा कर
उसमें अपनी दुआएं भर दी थी
शायद वही डोर है जो अब तक
हमको जोड़ के रहती है और
कभी न टूटती है और न ही उसमें
कभी कोई भी बल पड़ता है...
क्या वो मेरे तुम्हरा उन्स था या
दुआ थी जो उस गोद ने दी थी
वो क्या है जो अभी है ..
वो क्या है जो हमेशा रहेगा...
यकीन है उसके होने का
लेकिन.. पता नहीं वो क्या है और क्यूँ है..
बस है.. इतना काफी है..

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