Friday, August 5, 2011

पैसा


तेरे हाथों में कभी दिखता नहीं

फिर भी इसके नाम में दम बड़ा है
फ़क़त इसके  नाम के बल पे तूने
जाने क्या क्या हासिल किया है
शोहरत रुतबा इज्ज़त और
बड़े बड़े महलों की चमक
महँगी महँगी गाड़ियों से निकलता 
 वो धुआं भी कीमती होता होगा 
पौलूशन कम करता होगा वो धुआं शायद....
इक कागज़ ..इक दस्तखत ..
चंद लफ्ज़-अदद  और इक मोहर
इतना सा करके जाने क्या क्या
इस हाथ से उस हाथ हुआ है..
उस पार से जाने कितने पार किया है
इक और नया खिलौना लाये हो
घिसी साबुन कि टिकिया जैसा
स्कूल में पहचान का इक कार्ड मिला था
उसके जैसे कुछ दिखता है ये
 दस्तखत  लफ्ज़ कोई.
बस बटन दबाने पड़ते हैं..
जाने क्या कैसे होता होगा
बस अदद घुमाने पड़ते हैं..
मेरे तो दो छलनी हाथों से
इक इक करके छन कर गिर जाता है
जितना मैं हासिल करता हूँ..
ये उतना ही खो जाता है ..
तू कैसे कहता  है .. बहुत पैसा है...
तेरे हाथों में कभी दिखता नहीं
फिर भी इसके नाम में दम बड़ा है
फ़क़त इसके  नाम के बल पे तूने
जाने क्या क्या हासिल किया है

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