Wednesday, July 27, 2011

सुन न मेरी बात सखी



सुन न मेरी बात सखी
कैसे हैं ये दिन रात सखी
मेरे सारे सवालों का
कहाँ मिलेगा जवाब सखी

जब भी मैं सो जाती हूँ
सपनों में खो जाती हूँ
ये सारे तारे मिल जुल कर
तब ही करते क्यूँ बात सखी 
सुन न मेरी बात सखी
कैसे हैं ये दिन रात सखी

हाथों में जब पेंसिल होती है 
तब ही ये क्यूँ कांपते हैं
गुडिया हाथों में जब है होती 
हिलते नहीं क्यों तब हाथ सखी 
सुन न मेरी बात सखी
कैसे हैं ये दिन रात सखी

सुबह सुबह की किरण  हर दिन 
मेरे आगे पीछे  क्यों दौड़ती है 
दिन भर खेलती है मेरे संग
रात रहती नहीं क्यों वो साथ सखी 
सुन न मेरी बात सखी
कैसे हैं ये दिन रात सखी

टिप टिप टिप टिप बदल आकर
आंगन गीला क्यों करते हैं 
फिर भी उन बौछारों में क्यों
है खुशियों की सौगात सखी 
सुन न मेरी बात सखी
कैसे हैं ये दिन रात सखी

वो काला सा राक्षस गन्दा 
रात में ही क्यों दिखता  है 
दिन में जिस दिन मिल जाएगा 
खायेगा वो लात सखी 
सुन न मेरी बात सखी
कैसे हैं ये दिन रात सखी

जब भी गलती करती हूँ 
इतना डर क्यूँ  लगता है 
कोई तो मुझको रोकता है 
किसकी है वो आवाज़ सखी 
सुन न मेरी बात सखी
कैसे हैं ये दिन रात सखी

मैं इंसान ही क्यूँ हूँ और 
जानवर जानवर ही क्यूँ हैं 
आँखें बंद कर और फिर बोल 
क्या है कोई इसका जवाब सखी ?
सुन न मेरी बात सखी
कैसे हैं ये दिन रात सखी

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