Tuesday, July 26, 2011

जगहें



जाने कितनी जगहें घेरी होगी 
जाने कितना दम भरा होगा
इस जहां-ए-इत्तेफाक में मैंने
जाने क्या क्या छोड़ा होगा 
इक अल्ल्हड़ सा खेला होगा
जिसको बरसों तक झेला होगा
इक नज़र-ए-इनायत होगी
जिसमें सदियाँ बिताई होंगी 
इक बोसा होगा कोसा कोसा
रूह कों जिसने भिगोया होगा
इक चुभती हुई सी खीज होगी 
जिसने रातों में जगाया होगा
इक दाग होगा मोटा मोटा
जिस्म पे लिपटा हुआ जो होगा
कई पसीने वाले दिनों से
उसको घिस कर मिटाया होगा
इक हिसाब भी होगा आधा सा 
जाने किस किस का रखा होगा  
हर सांस में उसको जोड़ा होगा
हर सांस में उसको घटाया होगा
फलक का टुकड़ा नज़र में होगा
आंसू बन कर रिसता होगा
होठों से भी वो टकरा कर
आह बन बन के उड़ता होगा
इक फिक्र की टहनी होगी मोई
खारिश बदन कर करती होगी
ख़्वाबों के रेशमी चादर कों 
रूखे छेद वो करती होगी 
मेरे वजूद की मिटटी के कतरे
जाने कहाँ कहाँ बिखरेंगे
कितने ही घर  बनेंगे उसपे 
कितने ही शेहेर बसा करेंगे 
मैं चाहे कितनी कोशिश कर लूं
दुनिया में कम जगह लेने की
इक दिन तो इतना फैलूंगी
कि हर ज़र्रे में बिखरुंगी....
कितनी जगहें घेरी होगी ..

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