चाँदनी में सराबोर होने का
लुत्फ़ ही कुछ अलग होता है
जैसे तुम तुम नहीं
खुद चाँदनी का एक हिस्सा हो जाते हो..
दो हाथ जब छुएँ एक दूसरे को
तो टकरायें नहीं..
घुल जायें एक दूसरे में
सचमुच में जैसे
दो जिस्म एक जाँ हो जायें..
बड़ी अजीब कैफियत है चाँद की..
बेइन्तेहा इश्क़ भी है चाँदनी से और
उसको तमाम हयात पर लुटाना भी है
जैसे प्यार जब किसी से हो..
तो पूरे जहाँ में प्यार बाँटने को दिल करे..
ऐसे बशर कहाँ मिलते हैं आजकल..
उलफत में भीगे हुए वो दिल कहाँ हैं..
जिनका खुदा महबूब और वो खुदा
हर ज़र्रे में ... हर इंसान में था
जिनको जाँ- ए- जहाँ के आँसू
दिल पर घाव से लगते थे..
और चाँदनी में डूबे हुए दो दिल नहीं
दो जहाँ मालूम हुआ करते थे
वफ़ा- ओ- इश्क़- ओ-उन्स- ओ- उलफत में धुला
वो माहताब अब सिर्फ़ फलक पर है शायद..
या फिर शायद कभी कभी वो
तुम में दिखता है जानम!
जब जब तुम्हें चाँदनी में लिपटा
अपनी रूह में सिमटा पाया है
और जब भी आफताब बन कर तुम्हें
हर ज़र्रे को रौशन करते पाया है..
वो माहताब तुम ही लगते हो
और तब तब मैने खुद को
चाँदनी सा महसूस किया है..
और उस चाँदनी में सराबोर होने का
लुत्फ़ ही कुछ अलग होता है...

2 comments:
डूब के लिखा हुआ है लगता है.. वैसे फोटो भी बहुत अच्छी लगायी है
pic is so nice :)
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