Thursday, April 15, 2010

ज़ख्म




ज़ख्म भी अजीब होते हैं...
नामुराद भर जाते हैं...
कोई जाए तो भी
कोई आये तो भी
कोई न आये तो भी
वक़्त के पल्ले ये
कुछ यूँ बंधे हैं
कि वो चलता है
और ये भरते हैं
बस कोई खिलौना 
हाथ में दे दो तो 
रिश्वत का काम करता है
वक़्त जल्दी चलता है
कुछ खोने का एहसास
कहाँ रहता है ताउम्र 
सीख ही जाते हैं
किसी न किसी सहारे
जीना और जिंदा रहना
और खुश रहना हँसना
एक खासियत है इसकी पर
निशाँ छोड़े जाता है मुआं
जब नज़र पड़े तो
दर्द नही होता मगर
तीस ज़रूर होती है
कि यहाँ कभी कोई
ज़ख्म हुआ था...
आंह अपने नाम कोई
कर जाता है हर ज़ख्म
पर उनका क्या 
जो वक़्त थामे रहते हैं
ज़ख्म कुरेदते रहते हैं
ईमान से खुद्दार हैं
और दिल से मजबूर
कुछ ऐसे शख्स जो आज भी
हलक सुखाये बैठे हैं
आंख अध् भीगी करके वो
आस लगाए बैठे हैं
कि ज़ख्म से पहले जैसे थे
वैसे खुद बखुद हो जाएँ
ऐसों क्या करें जो
बुत बने बैठे हैं
बुतपरस्ती में उलझे हैं...
ऐसों का क्या करें.....


1 comment:

अपूर्व said...

ज़ख्मों का जिंदगी से रिश्ता भी सेम की बेलों की तरह होता है..दोनो तभी तक मजा देते हैं जब तक हरे रहें..और रिसते जख्म अहसास कराते रहते हैं कि जिंदगी अभी बाकी है..और दर्द भी..!..हाँ बुतों को दर्द नही होता होगा..मगर बुतपरस्त वाकिफ़ हैं ज़ख्मों की दर्द भरी दास्ताँ से...जिसके उधड़े धा्गों से वक्त अभी तक उन्ही ज़ख्मों मे तुरपन करता रहता है..
ज़ख्मों के दर्द भरे ज़ख्मों की कहानी कहती सुंदर कविता..