मैंने बहुत मुशक्कत की लेकिन मुझसे कुछ न हुआ
खींचा पटका दीवार पर दे मारा इसको फिर भी
इससे कोई फर्क नहीं पड़ा... ढीठ है शायद..
इसके जैसे से इसको कई बार भिड़ा दिया मैंने
कुछ देर भभका फिर वापिस वैसा ही हो गया
अपने में ही उलझा रहता है और अपने से ही उलझता है
खुद से ही टकराता है और खुद में ही बिखरता है
इसके परे इससे परे कुछ भी तो नहीं दिखता
कभी मुझमें पनपता है और कभी मुझसे ही बनता है
क्या चक्कर है और कैसा चक्कर है..
घूमता है कभी तो कभी मुझे ही घुमा देता है
जितना नापूं उतना बड़ा है और जितना समेटूं उतना छोटा
जितनी उजाले हैं इसमें उतने ही तो अँधेरे हैं..
एक कतरा है कायनात ..मगर सोचूँ कि इस कतरे में कितने कतरे हैं...
उसने कई रात जाग कर देखा..कहीं सबके सोने पर
कोई जादू तो नहीं करता वो!
फिर दिन भर आंक कर देखा.. कहीं हिसाब में
कोई फेर बदल तो नहीं करता वो!
सब कुछ तो साफ़ साफ़ दर्ज है... फिर क्यों सब माया में लिपटा है?
आंख तो धोखा खाती नहीं फिर क्यों खाती धोखा है?
मैंने बहुत मुशक्कत की मगर मुझसे कुछ न हुआ..
मेरे रचे इस खेल में सोचा न था की इतने झमेले हैं
एक कतरा है कायनात.. मगर सोचूं की इस कतरे में कितने कतरे हैं...

1 comment:
हेरत-हेरत हे सखी रहा कबीर हिराय
यही हासिल होता है इस कतरों मे कतरे गिनने वाले बेहद संजीदा से सवाल का..अक्सर स्टुपिड दिल जीनियस दिमाग को धक्के मार कर खुद स्टुपिड से सवाल करने लगता है..मगर तब उजाले मे उजाला नही खोजे मिलता..तो कभी रात के अंधेरे मे अँधेरा भी खो जाता है..
सुंदर नज्में हैं आपकी..मगर लगता है लिख्नना हाशिये की कगार पर है अब..
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