कई
जाने कौन सी बोली है है वो ... क्या कहते हैं उसको...
हर्फ तो वही जाने पहचाने से लगते हैं....
लफ्ज़ लेकिन ना जाने कैसे कैसे लगते हैं....
कुछ भी तो समझ नही पाती हूँ मैं ...
जाने क्या क्या तुझे कहते सुना है...
कई बार तुझे यूँ ही कुछ कहते सुना है ....
क्या मुझे बुलाते हो.. तड़प के बाहों में हमदम....
क्या क़िस्से पुराने सुनाते हो मुझे हमदम....
क्या दिल बातें बताते हो जो कभी कही नहीं...
या फिर ..
कई बार ऐवे ही कुछ गुनगुनाते हो हमदम...
कई बार तुझे यूँ ही कुछ कहते सुना है..
.मैं यूँ ही हंस कर तेरी आगोश में आ जाती हूँ...
मैं यूँ मचल कर तेरी बाहों में समा जाती हूँ..
मैं यूँ ही खिज कर करवट भी बदल देती हूँ....
कई बार तुझे यूँ ही मुझे मनाते सुना है...
क्या जाने कौन से लफ़्ज़ों में इज़हार कर जाते हो..
कई बार मैने यूँ ही... सब कुछ समझा है...
कई बार.. बातों से उठ कर.. मैने तुमको सुना है...
क्या जाने कौन सी बोली है .. क्या कहते हो हमदम....
जाने कैसे सब कुछ समझाते हो हमदम....
कई बार..
यूँ ही...
यूँ ही..
कई बार...

1 comment:
उफ्फ़.. ऐवें ही ऐसा लिखते हैं तो फार्म में आने पर कहर हो जाएगा..
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