Tuesday, January 12, 2010

जमघट


फ़क़त जमघट ही है.. कुछ मुख़्तसर से ख्यालों का
आईने में भाप बना कर लिखे कुछ लफ़्ज़ों सा
कलम घिसने का तक़ल्लुफ़ कौन करता है आजकल
ठक ठक ठक सब टाइप कर डालते हैं ख़याल
नज्मों का उन्वान आजकल mailbox में होता है
ग़ज़लों की वाह वाही comments में मिलती है
फ़क़त जमघट है कुछ मुख़्तसर से ख्यालों का
'del' के रहेम-ओ-करम के मोहताज़ कुछ लफ्ज़
मैं भी लेटे लेटे कुछ लिख देती हूँ ऐवेही कभी
लोग blog पे आकर वाह वाह कर जाते हैं..
mail कर दूं तो reply hit करना कोई बड़ी बात नही
'बोहोत खूब' तो मामूली लफ्ज़ हैं ताजपोशी के
कहाँ ये दो लफ्ज़ सुनने को पुश्तों पहले
मीर ग़ालिब तरस जाया करते थे और अब देखिये
हाल कुछ यूँ है कि उन्ही के किसी उला में
अपनी सानी जोड़ दो तो वाह वाही के पुल बांध जाते हैं
फ़क़त जमघट है .. कुछ मुख़्तसर से ख्यालों का
कार पर पड़ी धूल में कुछ लिखने सा है अब
कोई आके किये कराये पे पानी फेर जाता है
वो भी शायर कहलाता है और हम भी शायर...
क्या खेल है ये... कुछ ऐवे ही वाले लफ़्ज़ों का...

3 comments:

Savi said...

You give such beautiful shape to thoughts with the help of words and i go in to thoughts, everytime after reading your blog.

Savitha

Unknown said...

Upasana... beta ye dard paramparawaadi hone ka hai... har kaam ko karne ke reeti-rivaaj badalte rahe haiN aur badalte rahenge... thoughts ko sirf aanaa hota hai unki abhivyakti ka kya medium hoga ye unko pata nahi hota aur iss baat se koii fark bhi nahi padta... raha sawaal waah-waahi ka to uske liye poet ko saavdhaan rehna chaahiye kuchch hi waah-waahiyaaN accept karne ke liye hoti haiN... Thanks a lot for sharing a very frequently felt but very rarely expressed thought... Waah-waah...!!!

अपूर्व said...

खूबसूरत खेल है यह ऐंवे ही वाले लफ़्ज़ों का..आज की लेखकों की कुकुरमुत्ता-टाइप जमात पर खासा व्यंग्य भी..मगर यह बात तो है कि नया रास्ता वो खयाल ही बना पाते हैं जो जेहन की गलियों मे रास्ता भटक जाते हैं..खोए हुए खयाल ही कोलम्बस हुआ करते हैं अक्सर..और तरतीब के साथ पाले गये खयाल कभी रास्ता नही भटक पाते..जो बहुत दूर नही जा पाते..उनकी उम्र भी उतनी ही लम्बी होती है जितनी ड्राइंग-रूम मे खूबसूरत गुलदान मे रखे गये शोख फूलों की..या कि कार के बोनट पर जमीं धूल से बनी इबारत की...नया रास्ता बनाने के लिये पहले पुराने रास्ते को भूलना जरूरी होता है..और थोड़ा सा भटक जाना भी..फिर तो यही मुख्तसर खयाल कयामत होते हैं..
बोहोत खूब :-)