Sunday, October 11, 2009

नज़्म



नज़्म एक लम्हा है....
वक़्त के गाल पर ना गाह बोसे जैसा
हाथ धोने के बाद बची हुई छींटें
किसी के चेहरे पे मारने जैसा है
नज़्म एक लम्हा है
गलती करके कोई छोटी सी
जीभ बाहर करके आंखें भींचे
अजब अदा से सर कों खुजाना
बस वो इक पल कि मासूमियत सा है
नज़्म एक लम्हा है
चलते चलते चुपके से उनका हाथ थाम लेना
हया की लाली जो चेहरे पे आती है
बस वही नज़्म है
माँ कों बस यूँ ही गले लगा लेना
और उनका आंखें भर लेना
अपने बच्चे की पहली आवाज़
फ़क़त तितली जैसे ही आती है
पकड़ सको .... तो पकड़ लो
सेहर की हवा का झोंका है
भर सको रूह में ... तो भर लो
दिल बड़े प्यार से काढता है
इस खीर का लुत्फ़ ही और है!
नज़्म एक लम्हा है
लफ्जों के कैमरे में उतार सको
तो उतार लो...
नज़्म...

2 comments:

manu said...

बड़े अंकल (ग़ालिब) के नाम पर खींचे आये हम भी...

अच्छी नज़्म है....

अपूर्व said...

नज़्म को इतने अलग-अलग रंगों की खूबसूरत शीशों मे निहारना अच्छा लगता है..जैसे कि खुद की पुरकशिश यादों का अक्स वक्त के झिलमिलाते पानी मे दिख रहा हो..और एक लम्हा कितना समृद्ध, कितनी कायनात खुद मे समेटे, कितना खुशगवार हो सकता है यह उन लार्वों से पूछो जिनकी कुल जिंदगी का हासिल चंद लम्हों की दुनिया ही होती है...लफ़्जों के कैमरे मे उतरी नज्में जेहन की फोटोग्राफ़िक रील्स मे लम्बे वक्त तक महफ़ूज़ रहती हैं..हया की लाली के खुशगवार तसव्वुर की तरह..आपकी सुंदर नज्मों मे से एक..यकीनन..