Friday, May 22, 2009

आहट आहट भेजो न.....अपने आने का संदेसा


आहट आहट भेजो न
अपने आने का संदेसा
मुझे चाप चाप सुननी हैं
दिन गिन दिन गिन थक गई मैं
पल छिन घडियाँ गिननी है
आहट आहट भेजो न
अपने आने का संदेसा

मुंह फेर के बैठ जाउंगी
बिल्कुल बतियाँ नही करुँगी
फिर सोचूं की मान जाउंगी
सीधे उनसे गले मिलूंगी
चैन की झालर बुननी है
पल छिन घडियां गिननी है
आहट आहट भेजो न
अपने आने का संदेसा

छू लुंगी बालों को
चेहरे को हाथों को
चूंटी काट के देखूंगी
परे करुँगी खाबों को
कितनी तसल्ली करनी हैं
पल छिन घडियां गिननी है
आहट आहट भेजो न
अपने आने का संदेसा


क्या क्या होगा क्या न होगा
क्या पता क्या है खबरिया
क्या कहूँगी क्या सुनूंगी
लिख लिख काटूँ मैं बावरिया
कितनी ही बातें करनी हैं
पल छिन घडियां गिननी है
आहट आहट भेजो न
अपने आने का संदेसा



जैसा मैंने सोचा है
क्या सब वैसा ही होगा?
या फिर दूर दूर से ही
एक दूजे को ताकना होगा
तिरछी नज़रों से तुम
क्या बस देखते ही रहोगे
या फिर मंद मंद मुस्का के
"कुछ नही" ये कहते रहोगे.....
मैं पैर पटक के चल दूंगी
और तुम रोकते रहना
बस ऐसे ही बातें करनी हैं
पल छिन घडियां गिननी है
आहट आहट भेजो न
अपने आने का संदेसा

No comments: