Friday, June 19, 2009

हिज्र



जी हमसे तो दिन विन न गिने जाते हैं
सुबह से लेके शाम करो
रात में पेहेरों जाप करो कि कब!
कब होगी कमबख्त सुबह
घंटों से मिनट से सेकंड नही गिने जाते हैं

देखा था इक पगली को..
पल पल गिनते हुए किसी दिन
कहती थी इतने पहर इतने सेकंड
फकत इतने ही घंटे बाकी हैं
किस लिए जो पूछा मैंने
तो कहती उनके मिलने में
बस इतने ही पल बाकी हैं
धत! कह कर मैं चल दी थी
और फिर रस्ते भर हंसती ही रही
दुनियादारी और रोजगारी क्या कम थी
जो ये सब काम करें!
जीना यूँ ही दूभर है उसपे
क्यों वेल्लों जैसे काम करें

हमसे तो हफ्ते कटते हैं और
महीने पार किये जाते हैं
सोम से शनी जीए जाते हैं और
रवि पे वार किये जाते हैं
गिनती वैसे अपनी भी अच्छी है
देखो कैसे गिनते रहते हैं
सन्डे पे हफ्ता बदला और
३० पे मास बदल देते हैं

उनके आने कि राह तो हम भी
अक्सर तकते रहते हैं
नींद मगर ज्यादा है प्यारी
सपने में इंतज़ार किया करते हैं
मुश्किल से तो इश्क हुआ है
आसानी से तो करने दो
हिज्र कि घड़ियों बहुत मुश्किल हैं
विसाल कि यादें गिनने दो

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