
वक्त कहाँ है हमारे पास पढने लिखने का
हमारी किताबें चूल्हे की आग में तपती हैं
कच्चे घडे बनकर ...
हमारी किताबें चूल्हे की आग में तपती हैं
कच्चे घडे बनकर ...
और पक के मर्तबान बन जाती कच्छ
कभी कभी घडों पर डिजाईन बनाते हुए मैं
कुछ अक्षर बना दिया करती हूँ ...
वो स्कूल में १२३ पढ़े थे न वैसे ही...
माँ कहती है .... काश मुझे भी भइया जैसे स्कूल भेज पातीकभी कभी घडों पर डिजाईन बनाते हुए मैं
कुछ अक्षर बना दिया करती हूँ ...
वो स्कूल में १२३ पढ़े थे न वैसे ही...
लेकिन फिर मेरी छोटी बहन का ख़याल कौन रखेगा!
पापा होते तो मैं जाती स्कूल माँ घर पे रहती पीछे
और जैसे मैं सबके लिए खाना पका के रखती हूँ
माँ हमारे लिए खाना पका के रखती न..
रेड रिब्बन और वो सिलेटी स्कर्ट के साथ काले जूते देख के
बड़ा मन करता है .. फिर जब लक्ष्मी भी रोती है तो
सब फितूर सर का दूर ही हो जाता है॥
घर की सफाई.....बर्तन.... कपड़े ....खाना .....लक्ष्मी की देख भाल..
कितना कुछ तो करना है मुझे..
वक्त कहाँ है हमारे पास पढने लिखने का!!!
भइया कहता है की तेरी शादी करा देंगे
अपने बचों को ही पढ़इयो तू फिर
मैं सोचती हूँ .. मैं भी माँ जैसी ही बन जाउंगी क्या ???
काम काज करती करती सोचूंगी की काश अपनी बेटी को पढ़ा पाती
लेकिन फिर कुछ भी तो नहीं कर पाउंगी न....... क्यूंकि
वक्त ही कहाँ होगा उसके पास.. पढने लिखने का
उसकी किताबें तो चूल्हे की आग में तपेंगी
कच्चे घडे बनकर......
और पक कर मर्तबान बन जायेंगी
वो भी कहीं तो १२३ या ABCD लिखेगी और सोचेगी
एक दिन अपने बच्चों को पढाउंगी अच्छे से॥
मगर ....
1 comment:
"Kitaabein Choolhe ki aag me tapengi..." thodi jyaada matter of fact kavita hai, lekin iski sachaai ne ise kaafi pathniya bana diya!
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