Monday, March 16, 2009

ऐ खुदा


ऐ खुदा सुन मेरे खुदा
तू ही हर जगह
तुझको पाऊं कहाँ खोऊँ कहाँ मैं

मुझ में तू ऐसे ही रहा
कायनात में हो जैसे सारी ज़मीन और आसमा


खो ही जाऊं मैं
आ तुझमें खो ही जाऊं मैं
छुपा ले चांदनी हूँ मैं
बादल मेरे..........


रूह बन ज़रा
आ मेरी रूह बन ज़रा
आ जिस्मों के पार हम मिलें
साथी मेरे



खुल के मिल न

ऐ खुदा सुन मेरे खुदा
तू ही हर जगह
तुझको पाऊं कहाँ .....मैं

गोटियों को भिड़ा के सय्यार में
ज़िन्दगी को उगा दें चल कहीं
कुछ ऐसे मिलें हम दिलबर मेरे
फर्क कोई न हो फिर कहीं

तुझमें ऐसे मुझे खोना है...

सुन न

ऐ खुदा सुन मेरे खुदा
तू ही हर जगह
तुझको पाऊं कहाँ खोऊँ कहाँ


खो ही जाऊं मैं
आ तुझमें खो ही जाऊं मैं
छुपा ले चांदनी हूँ मैं
बादल मेरे.......


रूह बन ज़रा
आ मेरी रूह बन ज़रा
आ जिस्मों के पार हम मिलें
साथी मेरे..........

ऐ खुदा सुन मेरे खुदा
तू ही हर जगह
तुझको पाऊं कहाँ मैं

2 comments:

kunalc said...

khone paane kaa jo ye silsila hai...Khuda kare yuhi jaari rahe....
awesome poem hai ji....

pallavi trivedi said...

बड़ी सूफियाना नज़्म है....खुदा को पाने की एक बेचैनी सी है!