Thursday, February 26, 2009

तुमको कागज़ पर लिखती हूँ मैं

तुमको कागज़ पर लिखती हूँ मैं

कुछ ऐसे कि बस मैं ही पढ़ पाऊं

कौन सा गोला किस और मुडा है

किस लकीर को कहाँ मिलाऊं

तेरा वो रंग किस स्याही से लिखू मैं

वो पहलू किन लफ्जों से कहूं

मुस्कान की बोली बयान कैसे हो?

खामोशी क्या है कैसे कहूं?

आयत आयात पहना है जिसको

आहट आहट सुना है जिसको

वो सब कागज़ पर लिखती हूँ मैं

कुछ ऐसे कि बस मैं ही पढ़ पाऊं

पेन में स्याही भरनी ही क्यों है

मैंने ही तो पढना है

फिर भी सोचूं कि इंक चेक करून

कितना कुछ तो लिखना है

तहरीरों और नक्शों को मैं

सिलवट सिलवट ठीक करुँ

गलत मलत कुछ हो जाए तो

रबर पे थूक लगा कर साफ़ करुँ

अच्छा अच्छा साफ़ साफ़ सा

तुमको कागज़ पर लिखती हूँ मैं

कुछ ऐसे कि बस मैं ही पढ़ पाऊं

लेकिन फिर डर भी लगता है

पेन की निब चलने से बनी उन

तहरीरों को कोई पढ़ ले गर तो?

मेरी नज़रों से देख के तुमको

फट से कोई पहचान ले गर लो?

बस यही सोच के सब कुछ लिख के

गुच्च्ड मुच्हड़ कर देती हूँ मैं

तुमको कागज़ पर लिखती हूँ मैं

कुछ ऐसे कि सिर्फ मैं ही पढ़ पाऊं

1 comment:

pallavi trivedi said...

bahut achcha likha hai...kuch alag sa.