तुमको कागज़ पर लिखती हूँ मैं
कुछ ऐसे कि बस मैं ही पढ़ पाऊं
कौन सा गोला किस और मुडा है
किस लकीर को कहाँ मिलाऊं
तेरा वो रंग किस स्याही से लिखू मैं
वो पहलू किन लफ्जों से कहूं
मुस्कान की बोली बयान कैसे हो?
खामोशी क्या है कैसे कहूं?
आयत आयात पहना है जिसको
आहट आहट सुना है जिसको
वो सब कागज़ पर लिखती हूँ मैं
कुछ ऐसे कि बस मैं ही पढ़ पाऊं
पेन में स्याही भरनी ही क्यों है
फिर भी सोचूं कि इंक चेक करून
कितना कुछ तो लिखना है
तहरीरों और नक्शों को मैं
सिलवट सिलवट ठीक करुँ
गलत मलत कुछ हो जाए तो
रबर पे थूक लगा कर साफ़ करुँ
अच्छा अच्छा साफ़ साफ़ सा
तुमको कागज़ पर लिखती हूँ मैं
कुछ ऐसे कि बस मैं ही पढ़ पाऊं
लेकिन फिर डर भी लगता है
पेन की निब चलने से बनी उन
तहरीरों को कोई पढ़ ले गर तो?
मेरी नज़रों से देख के तुमको
फट से कोई पहचान ले गर लो?
बस यही सोच के सब कुछ लिख के
गुच्च्ड मुच्हड़ कर देती हूँ मैं
तुमको कागज़ पर लिखती हूँ मैं
कुछ ऐसे कि सिर्फ मैं ही पढ़ पाऊं
1 comment:
bahut achcha likha hai...kuch alag sa.
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