
ऊपर नीचे की दोनों पलकों पे उसका चेहरा सरमाया है.
ये दुनिया अब उससे गुज़र कर दिखती है.
आंखें भीचूं तो वोह भी क्यों सिकुड़ता है अल्लाह!
और जीतनी बड़ी करूँ वोह उतना ही बढ़ जता है.
मेरे अश्कों की छींटें उसके गालों पर क्यूँ पड़ती हैं,
और नींद पड़े वोह खाब में क्यों सरक आता है?
आखिरी बार जब जी भर के देखा था उसको मैंने...
शायद उसका अक्स आँख में चला गया होगा।
ये दुनिया अब उससे गुज़र कर दिखती है.
आंखें भीचूं तो वोह भी क्यों सिकुड़ता है अल्लाह!
और जीतनी बड़ी करूँ वोह उतना ही बढ़ जता है.
मेरे अश्कों की छींटें उसके गालों पर क्यूँ पड़ती हैं,
और नींद पड़े वोह खाब में क्यों सरक आता है?
आखिरी बार जब जी भर के देखा था उसको मैंने...
शायद उसका अक्स आँख में चला गया होगा।
०६-०७-२००७
2 comments:
आंखें भीचूं तो वोह भी क्यों सिकुड़ता है अल्लाह!
और जीतनी बड़ी करूँ वोह उतना ही बढ़ जता है.
just superb!!!!
आखिरी बार जब जी भर के देखा था उसको मैंने...
शायद उसका अक्स आँख में चला गया होगा।
kya baat hai.....beautiful.
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