Sunday, November 16, 2008

अक्स


ऊपर नीचे की दोनों पलकों पे उसका चेहरा सरमाया है.
ये दुनिया अब उससे गुज़र कर दिखती है.
आंखें
भीचूं तो वोह भी क्यों सिकुड़ता है अल्लाह!
और
जीतनी बड़ी करूँ वोह उतना ही बढ़ जता है.
मेरे
अश्कों की छींटें उसके गालों पर क्यूँ पड़ती हैं,
और
नींद पड़े वोह खाब में क्यों सरक आता है?
आखिरी
बार जब जी भर के देखा था उसको मैंने...
शायद
उसका अक्स आँख में चला गया होगा

०६-०७-२००७

2 comments:

डॉ .अनुराग said...

आंखें भीचूं तो वोह भी क्यों सिकुड़ता है अल्लाह!
और जीतनी बड़ी करूँ वोह उतना ही बढ़ जता है.
just superb!!!!

pallavi trivedi said...

आखिरी बार जब जी भर के देखा था उसको मैंने...
शायद उसका अक्स आँख में चला गया होगा।
kya baat hai.....beautiful.