
बस एक लम्हा ही काफ़ी है
भूल जाने को या याद आने को
मानो जैसे किसी के जादू सा कर दिया हो
चुटकी बजी सुई हिली और बस
छू मंतर ही हो जाते हैं ना
तन्हाई में बैठे बैठे
या भीड़ में ही सही कहीं
लेकिन जब एक दम से खो से जाते हैं
किसी और दुनिया में निकल जाते हैं
कुछ होश नहीं होता किसी का
पलक झपकी या नही.. साँस ली की नही
खा पी रहे हो या नहीं..
मानो खुली आँखों से
सोते हुए खाब देख रहे हैं
फिर क्या होना है..
चाय में डुबोया हुआ बिस्कुट जब
मुँह तक आते आते गोद में गिर जाता है
हड़बड़ा के होश में आते हैं
और लगभग भूल ही जाते हैं कि
कहाँ थे....क्य सोच रहे थे
रह जाती है तो एक मुस्कान या गहरी साँस
कि चलो बैठे बिठाए घूम आए...
है ना...!
2 comments:
sahi kaha ...aisa hi hota hai jab khayaalon mein kho jate hain.
yeh mummi pe fit baithta hai
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