Thursday, January 1, 2009

छू मंतर


बस एक लम्हा ही काफ़ी है
भूल जाने को या याद आने को
मानो जैसे किसी के जादू सा कर दिया हो
चुटकी बजी सुई हिली और बस
छू मंतर ही हो जाते हैं ना
तन्हाई में बैठे बैठे 
या भीड़ में ही सही कहीं
लेकिन जब एक दम से खो से जाते हैं 
किसी और दुनिया में निकल जाते हैं
कुछ होश नहीं होता किसी का
पलक झपकी या नही.. साँस ली की नही
खा पी रहे हो या नहीं..
मानो खुली आँखों से 
सोते हुए खाब देख रहे हैं
फिर क्या होना है.. 
चाय में डुबोया हुआ बिस्कुट जब 
मुँह तक आते आते गोद में गिर जाता है
हड़बड़ा के होश में आते हैं
और लगभग भूल ही जाते हैं कि 
कहाँ थे....क्य सोच रहे थे 
रह जाती है तो एक मुस्कान या गहरी साँस
कि चलो बैठे बिठाए घूम आए...
है ना...!

2 comments:

pallavi trivedi said...

sahi kaha ...aisa hi hota hai jab khayaalon mein kho jate hain.

Tamanna said...

yeh mummi pe fit baithta hai