अरज उठी है हिवडे मा मोरे
आजी सुणानी है साजण को
जब जब लट उड़ उड़ के आए
म्हारे मुख की बान्छण को
होठ पे अटके केस दिखें जो
कान के पीछे कर दीजो
बस इतनी अरज मोरी सुण लीजो
मोरे सजन जी इतना कर दीजो
राह तकत जब बसूँ मैं तिहारी
भारी भारी पलकण हों
और उसपे जब तुम पधारो पीया जी
झूमत झूमत पग सीचूं
भांह पकड़ तब पास बिठाना
गोद मां सर को धर दीजो
बस इतनी अरज मोरी सुण लीजो
बावरी पगरी जो भी लगूँ जी
भई तो तिहारी दासी रे
एक दरस की एक
कितणों जनम से प्यासी रे
पूछे पिया का देस कोई तो
आपणों देह को कहती हूँ
तोरी छवि कोई पूछे तो मैं
आपणों भेस को कहती हूँ
अरज उठी है हिवडे मा मोरे
लुक छुप लुक छुप बोहोत भया जी
इक दूजन के ताकन को
आओगे अब जब भी तुम तो संग मा
लाणां सहनाई वादन को
बस इतनी अरज मोरी सुण लीजो
मोरे सजन जी इतना कर दीजो

3 comments:
बहुत ही सुन्दर गीत है और बहुत ही बढिया फोटों।बधाई स्वीकारें।
bahut hi badhiya..
bahuth hi manmohak hai ji ... aati sundar
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