Monday, October 13, 2008

अरज


अरज उठी है हिवडे मा मोरे

आजी सुणानी है साजण को

जब जब लट उड़ उड़ के आए

म्हारे मुख की बान्छण को

होठ पे अटके केस दिखें जो

कान के पीछे कर दीजो

बस इतनी अरज मोरी सुण लीजो

मोरे सजन जी इतना कर दीजो


राह तकत जब बसूँ मैं तिहारी

भारी भारी पलकण हों

और उसपे जब तुम पधारो पीया जी

झूमत झूमत पग सीचूं

भांह पकड़ तब पास बिठाना

गोद मां सर को धर दीजो

बस इतनी अरज मोरी सुण लीजो

मोरे सजन जी इतना कर दीजो


बावरी पगरी जो भी लगूँ जी

भई तो तिहारी दासी रे

एक दरस की एक मिलन की

कितणों जनम से प्यासी रे

पूछे पिया का देस कोई तो

आपणों देह को कहती हूँ

तोरी छवि कोई पूछे तो मैं

आपणों भेस को कहती हूँ


अरज उठी है हिवडे मा मोरे

आजी सुणानी है साजण को

लुक छुप लुक छुप बोहोत भया जी

इक दूजन के ताकन को

आओगे अब जब भी तुम तो संग मा

लाणां सहनाई वादन को

बस इतनी अरज मोरी सुण लीजो

मोरे सजन जी इतना कर दीजो






3 comments:

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत ही सुन्दर गीत है और बहुत ही बढिया फोटों।बधाई स्वीकारें।

कुश said...

bahut hi badhiya..

प्रवीण पराशर said...

bahuth hi manmohak hai ji ... aati sundar