Saturday, September 6, 2008

देखो तो जग कितना प्यारा सा है…


छोटे से हाथों में तितली समाती नहीं

छोटी सी आँखों ने मगर आसमान देखा है

बहती ये नदिया पकड़ में तो आती नहीं

सागर को मुंह ने मगर चख के तो देखा है

देखो तो जग कितना प्यारा सा है…


मेरी भुजाओं में चारों दिशायें हैं

चलने पे ठोकर भी खाती हवाएं हैं

पन्छी तो सुर में ही गाते हैं हरदम

मिलके सजायें ये दुनिया हम तुम

देखो तो जग कितना प्यारा सा है…


चम चम के जुगनू जब आते हैं रातों में

पकडूँ तो फट से गुम हो जाते हैं हाथों में

चंदा के झोले में जाके छिप जाते हैं

लेकिन नज़र में सभी के वो आते हैं

देखो तो जग कितना प्यारा सा है…


गिरता है पानी तो पत्ते भिगोता है

सूरज मगर आके सारा सुखाता है

बदल पे अटकी हुई बूंदों से झगड़ता है

गुस्सा मगर सारा जग पे बरसता है

देखो तो जग कितना प्यारा सा है…


बाहें फैला के कभी सर को झुकाके

आभार मानें सभी कि हम आए यहाँ पे

चलो मिलके सलोने से जहाँ को सवारें

ताकि हो जाए कहीं सब कुछ ये गुम

देखो तो जग कितना न्यारा सा है….

~


5 comments:

kunalc said...

bohot pyaara hai par jaldi khatam ho gaya......

डॉ .अनुराग said...

गिरता है पानी तो पत्ते भिगोता है

सूरज मगर आके सारा सुखाता है

बदल पे अटकी हुई बूंदों से झगड़ता है

गुस्सा मगर सारा जग पे बरसता है


बहुत खूब.......अपने ब्लॉग को ओर लोगो तक पहुचाने के लिए ब्लोग्वानी ओर चिट्ठाजगत से जुडो .....

दिव्यांशु शर्मा said...

sateek hai.... :-)

pallavi trivedi said...

गिरता है पानी तो पत्ते भिगोता है

सूरज मगर आके सारा सुखाता है

बदल पे अटकी हुई बूंदों से झगड़ता है

गुस्सा मगर सारा जग पे बरसता है

देखो तो जग कितना प्यारा सा है…


waah..kya baat hai. bahut khoobsurat likha hai.

योगेन्द्र मौदगिल said...

खूबसूरत अहसास
आपको बधाई