Wednesday, August 13, 2008

साँस


फूँक दो साँस मुझमें ऐ हमदम

ज़रा सी जान मुझमें भर दो ना

बगैर आहट के आओ और जुल्फें बिखेर दो मेरी

या एक काम करो.. जब मैं सो जाऊं..

लटों में मेरा चेहरा छुपा ही देना तुम…

फूँक दो साँस मुझमें ऐ हमदम

सर्दियों में शाल में लिपटे

हथेलियों को सहलाते हुए सुबह में

सुनाओगे ताज़ा कोई ग़ज़ल जब मुझपे

तो बस उसी पल जी उठेंगे हम….

फूँक दो साँस मुझमें ऐ हमदम

जब सजूँगी तुम्हारी ही खातिर

और तुम बेकरार बैठोगे..

और मुझे देख के तुम्हारे लब से

लफ्ज़ सारे ही हवा हवा होंगे

बस उसी पल पे कुर्बान हैं सब ग़म

फूँक दो साँस मुझमें ऐ हमदम

ताज़ा ताज़ा से झगडों में अक्सर

दोनों चुप चाप ही बैठ जायेंगे

और मनाने का मन करेगा जब

फूँक देंगे न गुस्से को तब हम

बस उसी के लिए ही साँसे हैं

आती जाती यही तो कहती हैं…

तुम्हारे नाम काम साथ का ही

जिस्म दम भरता है और है जान भी तभी

फूँक दो साँस मुझमें ऐ हमदम

ज़रा सी जान मुझमें भर दो ना...


9 comments:

art said...

bahut hi bhaavpurna anubhuti

Ila's world, in and out said...

खूबसूरत,भावपूर्ण रचना.

डॉ .अनुराग said...

फूँक दो साँस मुझमें ऐ हमदम

ताज़ा ताज़ा से झगडों में अक्सर

दोनों चुप चाप ही बैठ जायेंगे

और मनाने का मन करेगा जब

फूँक देंगे न गुस्से को तब हम

बस उसी के लिए ही साँसे हैं

आती जाती यही तो कहती हैं…

तुम्हारे नाम काम साथ का ही

जिस्म दम भरता है और है जान भी तभी

फूँक दो साँस मुझमें ऐ हमदम

ज़रा सी जान मुझमें भर दो ना...


bahut khoobsurat....bahut...

कुणाल किशोर (Kunal Kishore) said...

फूँक दो साँस मुझमें ऐ हमदम
ज़रा सी जान मुझमें भर दो ना...

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भगवान करे तुम्हारे दिल के बैलुन मे कोई युँ ही साँस भरते रहे और तुम्हारे दिल की उँची उडान होती रहे और हमे ऐसे नज्म मिलते रहे... बहुत ही खुबसुरत|

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा, क्या बात है!

Unknown said...

bhaari roomani hai...umda..

केतन said...

जिस्म दम भरता है और है जान भी तभी

फूँक दो साँस मुझमें ऐ हमदम

ज़रा सी जान मुझमें भर दो ना...


umda tasavvur... gehre ehsaas... aur shokh jazbaat... bahut hi sundar kalaam... :)

डाॅ रामजी गिरि said...

हथेलियों को सहलाते हुए सुबह में

सुनाओगे ताज़ा कोई ग़ज़ल जब मुझपे

तो बस उसी पल जी उठेंगे हम….


लफ्जों को दिल से जोड़ कर रूमानी तरंग पैदा कर दी है आपने...

डाॅ रामजी गिरि said...

हथेलियों को सहलाते हुए सुबह में

सुनाओगे ताज़ा कोई ग़ज़ल जब मुझपे

तो बस उसी पल जी उठेंगे हम….


लफ्जों को दिल से जोड़ कर रूमानी तरंग पैदा कर दी है आपने...