Sunday, June 29, 2008

आखिरी नज़्म


ये इश्क हमको ले गया
तेरे
करीब इस कदर
तुझी
से हम गुज़र गए
रहा
मगर तू बेखबर

कदम कदम के फासले
कदम
कदम ही तय किए
हरिक
कदम फिराक का
लगा
कदम विसाल का

मुझे तो रोज़ ही लगे
तमाम
उम्र कट गई
कि
रोज़ ही मरा किए
कि
रोज़ जिंदगी मिली

मना करो कि तूल दो
हमें
तो इश्क हो गया
करम
करो कि जान लो
मेरा
तो काम हो गया

मुझे तो है यकीन कि
उसे
ख़याल है मेरा
उसे
है ये यकीन कि
यकीन
है ये बेवजह

शिकायतें हिदायतें
रवायतें
हिकायतें
यहाँ
नहीं यहाँ नहीं
कहीं
नहीं कहीं नहीं

मना करे जो तू हमें
वो
काम हम करेंगे क्या!
नहीं
नहीं नहीं नहीं
कभी
नहीं कभी नहीं

कहेंगे जो भी नक्श हम
वो
होगा तेरे नाम पे
तुझे
तो सब पता ही है
यहाँ
पे अब कहेंगे क्या



2 comments:

Anonymous said...

Nice one ... particularly the last para ... keep it up.
- orioness@gmail.com

प्रवीण पराशर said...

वाह !!!!!! तुझी से हम गुज़र गए
रहा मगर तू बेखबर , दिल जीत लिया जी क्या लाइन लिखा है..