Friday, June 6, 2008

इंतकाल


मेरे दिल से निकली आवाजें अक्सर
जिस्म से टकराकर रूह में ही धुआं हो जाती हैं
दम घुटता है अब इस गूबार में
जाने कितनी आहें, चीखें, फरियादें गूंजती रहती हैं
दिन भर कानो में शोर करती रहती हैं
जिस्म कि तलहटीं में खून रिसता रहता है नालियाँ बनाकर
और गले में बादल सूखे पड़े रहते हैं आवाजों के इंतज़ार में
कि कब बाहर आयें और सुर जम कर बरसें
कुछ कुछ अन्दर बाहर रेंगता है
दिल बड़ा सहमा सा रहता है उनके कारण
नफ्सों तक फड़कने कि आहट होती है
दिमाग का जंगल गिरहों से उलझा पडा है
कभी खींचती हैं तो
भोहों की त्योरियां चढ़ जाती हैं
मेरे अन्दर का जहाँ बड़ी खुशहाली की मौत मर रहा है
मेरे इंतकाल पर देखना कितना सब्ज़ नज़ारा होगा!

3 comments:

डॉ .अनुराग said...

जिस्म कि तलहटीं में खून रिसता रहता है नालियाँ बनाकर
और गले में बादल सूखे पड़े रहते हैं आवाजों के इंतज़ार में
कि कब बाहर आयें और सुर जम कर बरसें
कुछ कुछ अन्दर बाहर रेंगता है
दिल बड़ा सहमा सा रहता है उनके कारण
नफ्सों तक फड़कने कि आहट होती है
दिमाग का जंगल गिरहों से उलझा पडा है
कभी खींचती हैं तो
भोहों की त्योरियां चढ़ जाती हैं
मेरे अन्दर का जहाँ बड़ी खुशहाली की मौत मर रहा है
मेरे इंतकाल पर देखना कितना सब्ज़ नज़ारा होगा!

गुलज़ारिश. अंदाज...बेहद खूबसूरत....

Shreya said...

:)..bahut achhe :)

Shishir Shah said...

aap ka andaz-e-bayan-e-haal dil chhu gaya...har lafz mein chingari...aur aakhri do lines mein to kissa tamam ho gaya...
मेरे अन्दर का जहाँ बड़ी खुशहाली की मौत मर रहा है
मेरे इंतकाल पर देखना कितना सब्ज़ नज़ारा होगा!