Tuesday, May 27, 2008

नज़्म उतरना चाहती है




नज़्म उतरना चाहती है

पर लिखें क्या?

हर बात खुद को दोहराती है

हर लफ्ज़ वही सब कहता है

कि अब भी वक़्त वहीं ठहरा है

वही पल अब तक बीत रहा है

कुछ छम छम करता है अब भी

कुछ साँसें उखड़ी उखड़ी सी हैं

नज़्म वही सब कहती है

जो हर बार ही कहती रहती है

हर अंदाज़ बयान कर चुकी है ये

हर मौसम को जी चुकी है ये

वो एहसास जो छलके थे पहली बार

वो फिर से छलकते हैं अब भी

जब आँख फिर से नम होती है

जब याद दिलों को डुबोती है

जब मौसम लौट के आता है

तब नज़्म उतरना चाहती है

पर सोच में हूँ

कि जो सब कह चुके

सफहों पे कल के

वो सब अब दोहरायें क्या

पर नज़्म उतरना चाहती है

पर लिखें क्या?

चलो पलटते हैं लम्हें

जब ठहरा वक़्त खुद को दोहरा सकता है

तो हम भी क्यूँ ना ऐसा कर लें

जो कल अब तक जी रहे हैं

उसको जीते जीते फिर से जी लें

ना पल बीते ना आए कल ना आज रहे ही

लेकिन फिर भी कल को याद करें

और जी लें आज में कल को जो आया ही नही

तुम अब भी मेरे साथ चलो और बात करो

लेकिन हो कोई साथ नहीं और बात नहीं

और जो महसूस किया था थामे हाथ

वो नज़्म कहे और ये भी कहे कि

क्या लगता है जब है

हाथों में हाथ नही

क्या लिखें और क्या ना लिखें

सोच में हूँ की लिखें क्या

नज़्म उतरना चाहती है

पर लिखें क्या.......



4 comments:

आलोक said...

maktub जी, aivehi के माने क्या होते हैं?

दिनेशराय द्विवेदी said...

हिन्दी ब्लॉगजगत में आप का स्वागत है।
कृपया अपने टिप्पणी फार्म पर से वर्ड वेरिफिकेशन हटाएँ इस से टिप्पणी करने वाले को बहुत समस्या होती है और समय भी अधिक लगता है। इस के लिए आप अपने डैशबोर्ड में जा कर कमेंटस् में जाएँ और वहाँ वर्ड वेरिफिकेशन पर जा कर उसे नो कर दें।
धन्यवाद्
वर्ड वेरिफिकेशन हटा देने पर मुलाकात होगी।

Amit K Sagar said...

नज़्म उतरना चाहती है
पर लिखें क्या?
हर बात खुद को दोहराती है---behad umdaa rchna. likhte rahiye.
----
ultateer.blogspot.com

डॉ .अनुराग said...

बेहतरीन नज्म....अपने आप मे मुकम्मल.....