
चलो चाँद नापते हैं
तुम ज़रा सूरज वाली और चलना
मैं ज़मीन की तरफ का सिरा पकड़ती हूँ
देखो आँखें ना भींच लेना रास्ते में
बहुत रोशनी है आगे
ज़रा सा रास्ता भूले तो किसी उल्का में फँस जाओगे
फिर मुझे सिरा पकड़ के उल्टा चलना पड़ेगा
कितना अच्छा हो ना कि उस वक़्त
तुम पीछे से आके मुझे चौंका दो!
मैं सैय्यार की ज़मीन पे गिरते गिरते बचूँ
और तुम मुझे थाम के
चाँद कि ज़मीन पे बिठा दो
और फिर धुआँ हो जाए हर नाप-ओ-सिरा
कोई डोर ना बचे दरमियाँ……
और फिर चाँद नापे
दूरियाँ हमारे बीच की
मगर सिरा ना ढूँढ पाए
कुछ ऐसे भी एक बार मोहब्बत करते हैं
चलो चाँद नापते हैं
4 comments:
masha'allah !!!!
you just made me cry.
:)
गुलज़ार साहब की याद दिला दी आपने।
बधाई हो!!
Chalo chalo...
Chand Naapte hain.
Felt like doing this after reading.
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