Monday, May 26, 2008

चलो चाँद नापते हैं



चलो चाँद नापते हैं
तुम ज़रा सूरज वाली और चलना
मैं ज़मीन की तरफ का सिरा पकड़ती हूँ
देखो आँखें ना भींच लेना रास्ते में
बहुत रोशनी है आगे
ज़रा सा रास्ता भूले तो किसी उल्का में फँस जाओगे
फिर मुझे सिरा पकड़ के उल्टा चलना पड़ेगा
कितना अच्छा हो ना कि उस वक़्त
तुम पीछे से आके मुझे चौंका दो!
मैं सैय्यार की ज़मीन पे गिरते गिरते बचूँ
और तुम मुझे थाम के
चाँद कि ज़मीन पे बिठा दो
और फिर धुआँ हो जाए हर नाप-ओ-सिरा
कोई डोर ना बचे दरमियाँ……
और फिर चाँद नापे
दूरियाँ हमारे बीच की
मगर सिरा ना ढूँढ पाए
कुछ ऐसे भी एक बार मोहब्बत करते हैं
चलो चाँद नापते हैं 

4 comments:

Shreya said...

masha'allah !!!!

Psychotic Philosopher said...

you just made me cry.

:)

विश्व दीपक said...

गुलज़ार साहब की याद दिला दी आपने।
बधाई हो!!

Nimisha said...

Chalo chalo...
Chand Naapte hain.
Felt like doing this after reading.