दर्द किसी बच्चे से कम तो नहीं!
दिन भर जिस्म की धूप में खेलता रहता है.
कभी टकरा जाता है किसी दीवार से तो
या फिर गिर ही जाय ये अगर तो
खरोंच इसे लगती है और टीस मुझे होती है.
मेरा ही तो जन्मा है ये दर्द..
मुझी से निकला है और
मुझी में खो जाएगा.
मैं दिन भर इससे
एक जगह टिक के बैठने को कहती रहती हूँ
और ये दिन भर भागता रहता है हाथ छुड़ा के.
ना खुद ठीक से ख़ाता पीता है
और ना मुझे ही खाने देता है
और रात को जब तक कर टूट के बिस्तर पे लेटता है तो
बड़ा तड़प ता है थकान की दर्द से
सोता ही नहीं .. बड़ा तंग करता है ये..
और बड़ी मुश्किल से कुछ देर को सोता है तो
जाग जाता है कुछ पल में ही
और फिर तड़प ता है
सुबह जब इसे नींद पड़ती है तो
मेरे जागने का वक़्त हो जाता है........
खैर ,कुछ देर सही, चलो सोता तो है..
मुझे भी चैन मिलता है और इससे भी....
कभी कभी लगताहै..
दर्द और मुझमें माँ और बच्चे रिश्ता है.....
1 comment:
amazing !!!!!
ye sab likhne ke liye in feelings ko mehsoos karna padta hai....
it speaks a tale of agony one has faced. teri in compositions par comment karne ka mann nahi kar raha...feelings ko koi commet aank nahi sakti
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