Saturday, December 1, 2007

चौसठ



दफ्तर कि मामूलन आवाजों में आजकल
शाम कि नमाज़-ओ-आरती कि आवाज़ घुलती है
चाय में रूहानियत का जायका आता है
और हलक़ में इबादत चुभती है
खुदा रोज़ एहसास दिलाता है अपने होने का
और मैं रोज़ भूल जाती हूँ कि मैं हूँ के नही
काश एक दिन खुदा आके कह दे मुझे
कि हाँ तुम हो!
तुम भी इस बिसात का प्यादा हो
चलो के मैंने तुम पर दांव लगाया है
आखिरी खाने तक पहुंचे तो फिर देखना
एक और तमाशा-ऐ-जान ज़िंदा हो जायेगा
वजह तुम बन जाओगे उसके होने कि लेकिन
मेरी चौसठ मेरी बिसात खेल मेरा कहलायेगा

No comments: