Wednesday, November 21, 2007

चमकीली


उस दिन तुमने जो चमकीली बरसाई थी मुझे पर
कभी गांठें बनकर फलक पर अटक जाती हैं
और कभी कभी दिन चढ़े दिख जाती हैं
फूलों पे पत्तों पे टहनियों पे चमकती हुई सी
धुले हुए बर्तनों में भी चमकती हैं वो
और अँधेरे में street light पर पड़ी हुई
परदे के कोने से जगमगाती है कभी कभी
चलते चलते जब मेरी घडी पे सूरज कि किरण पड़ती है तो
आँखों में तुम्हारी चमकीली पड़ जाती है
और फिर आँखों से बह जाती हैं पानी पानी सी बनकर
तुम्हारी तस्वीर पे भी थोडी सी पड़ी है अब तक
सच मानो ! ये सब वही हैं, तुम्हारी बरसाई चमकीली
और वो जो wind chimes बजी थी उस दिन जादू जैसी
पता नही क्या है, आज तक बजे ही जा रही हैं!
ज़रा आके एक बार सुनो तो सही
अब तक रेलिंग पर पड़ी है चमकीली
सीढियों से अब भी फिसलती है वो
और मेरी बालियों पे भी है,( जो अब मैं पहनती ही नही)
मेरे लबों पर औंधे मुंह पड़ी मुस्कान से
ज़रा आकर ये भारी भरकम सी चमकीली हटा दो
जब से गए हो मुसुकुरा भी नही पा रही हूँ
और हाँ एक बात और
तुम ज़रा सी साँस जो दे दो मुझको
मैं भी चमकीली कि एक गाँठ से फिर इंसान बन जाउंगी
एक बार आके देखो तो सही क्या हाल है उसका
कभी कभी सिक्के जैसी बनती हैं और
कतरा कतरा रोज़ झड़ के उड़ती रहती हैं