Wednesday, November 14, 2007

इल्तिजा


तुम्हारे सब अल्फाज़ आंखों के सफ्हो पर आज भी दर्ज हैं
पलकें झपकाती हूँ तो तरंगें सी उठती हैं
और कुछ आवाजें भी सुनायी देती हैं
जो की असल में हैं ही नहीं
चंद पल कुछ यूँ आँखों के आगे से
गुज़र जाते हैं, जैसे कि
रेलवे स्टेशन पे ट्रेन आंखों के सामने से छूट जाए
मेरी उकताई हुई साँसे
कभी कभी धमकाती हैं कि अब और साथ नही देंगी
वो भी थक गयी हैं तुम्हारा नाम जपते जपते
और एक तरफ़ कंबख्त पलकें है कि
तुम्हारे तस्सवुरात से थकती ही नही
हाँ दो लफ्ज़ हैं जो लबों के किवाड़ पे
दिन रात पहरा देते रहते हैं
कही इज़हार--बेबसी कर दूँ मैं तुमसे
हाथ भी एक दूसरे को थाम के चलते हैं
कही फ़ैल कर लबों के बाँध तोड़ दें
कदम ख़ुद सँभालते हैं ख़ुद को
और दिल डावांडोल सा फिरता है
अब डरती हूँ मैं ख़ुद से ही
किसी भी दिन तूफ़ान सा जायेगा
और सब्र की नाव डूब जायेगी
तुम किनारे पे गलती से अगर आओ
तो ज़रा सी मदद कर देना
.. बस इतनी सी इल्तिजा है मेरी...

2 comments:

दिव्यांशु शर्मा said...

kahi izzhaar-e-bebasi na kar doon main tumse
haath bhi ek doosare ko thaam ke chalte hain
kahi fail kar labon ke baandh na tod dein....
hindi mein ek kaviya shailee hoti hai...Rahasya-vaad . usi kism ki rachna hai ye....sounds if u are talking to the Almighty....and if u are...ye kavita wo zaroor pasand kar rahe hongey..

upasanaa said...

Almighty!....mmm can say.
... talking to My God... My Idol...
:)