करवाचौथ पे उससे देखा नही था
तबसे नाराज़ है मुझसे..रूठ गया है
उसे पूरी उम्मीद थी, इस बात का भरोसा था कि
मैं तुम्हारे नाम का उपवास रखूंगी
सुबह से टकटकी लगाए उस दिन
चाँद दिन ढलने का इंतज़ार कर रहा था
मैंने भी सोच लिया था कि चाँद से छान के
तुम्हें "imagine"kar लूंगी, व्रत पूरा कर लूंगी
सूरज जब सर पे आया तो थोड़ा मुझे झटकाया
किस हक से तुमको पूजूँ मैं,किस हक से सिन्दूर लगाऊं
जब कि मैं तुम्हारी कुछ नही
ये बात और है कि अब तुम मेरे सब कुछ हो
व्रत तोड़ दिया मैंने.. बुझे मन से खाना खाया
करवे की पूरी कहानी सुनी चुपके से खिड़की से
सुहागनों को भी देखा सजे धजे मेंहदी लगे
चाँद निकल आया सबने कहा और मैंने सुना भी
गई नही छत पे, चाँद मेरी राह ताकता रहा
बालकनी में गई तो, लेकिन उसे नही देखा
जल भुन के राख था चाँद,आसमान काला था उस रात
और दिन हल्का सिन्दूरी होता है,
किसी सुहागन की भोर की मांग जैसा
ख़ुद को कोसती रही और समझाती रही
तुम मेरे कुछ नही हो...
चाँद नाराज़ है उस दिन से
आजकल छत पे नही आता
दिया जला के उससे मनाऊंगी अब मैं
कुछ दिन लेगा, लेकिन मान जायेगा
चाँद फिर आने लगेगा,
तुम्हारे लिए और क्या जलाऊं
कि तुम भी मान जाओ और आ जाओ......
No comments:
Post a Comment