
मेरे ज़हन में कई पोशीदा से पल रहते हैं,
यहाँ न दिन होता है न रात.
वक्त अपनी नाव को खूंटे से
साहिल पे बाँध के भूल जाता है.
लहरें आती तो हैं लेकिन जाती नही.
बालू के बवंडर उठते रहते हैं,
और बुझते भी हैं.
मानो आग निरंतर जल बुझ रही हो.
एक लम्हा है लेकिन;
एक मासूम अच्छे बच्चे जैसा,
दिन रात का फर्क मालूम है उससे.
सेहर चढ़े उठता है और,
दिन दिन जैसा रात रात जैसी गुजारता है.
तुम तो मुझे जैसे 'Statue' करके चले गए हो.
wo लम्हा लेकिन मेरी पलकों तले अब तक पडा है;
कितना हसीन खेल है तुम्हारा;
सिर्फ़ पलकें हिला सकते हैं....
यहाँ न दिन होता है न रात.
वक्त अपनी नाव को खूंटे से
साहिल पे बाँध के भूल जाता है.
लहरें आती तो हैं लेकिन जाती नही.
बालू के बवंडर उठते रहते हैं,
और बुझते भी हैं.
मानो आग निरंतर जल बुझ रही हो.
एक लम्हा है लेकिन;
एक मासूम अच्छे बच्चे जैसा,
दिन रात का फर्क मालूम है उससे.
सेहर चढ़े उठता है और,
दिन दिन जैसा रात रात जैसी गुजारता है.
तुम तो मुझे जैसे 'Statue' करके चले गए हो.
wo लम्हा लेकिन मेरी पलकों तले अब तक पडा है;
कितना हसीन खेल है तुम्हारा;
सिर्फ़ पलकें हिला सकते हैं....
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