Wednesday, May 13, 2015

अमलतास (Amaltas)






सुबह सुबह मैं पार्क में टहलने जाता हूँ तो,
मेरी राहों पर अमलतास के फूल बिखरे पड़े होते हैं।
यूँ लगता है मानो किसी की राह तकते तकते,
बस अभी अभी आँख लगी हो उनकी। 
ये शब भर का इंतज़ार बड़ा मुश्किल होता है...
चांद आता है, तारे आते हैं, जुगनू आते हैं। 
एक भीनी सी खुशबू लिए मदमस्त हवा बहती है। 
ऐसे कोई मुन्तज़िर राह तकता रह जाए,
तो क्या बीतती होगी, ये मुझसे न पूछो!
हालांकि मैं जानता ज़रूर हूँ। 
बस उस बेचैन सुकूत को सुनो,
उस बेज़ार खामोशी को देखो जो के
ज़ाहिर है अमलतास के चहरे पर...
हां मगर ये मुरझाए नहीं है अब तलक,
शायद इन्हें उम्मीद है के तुम आओगे...
चांदनी में भीगे न सही, किरणों में नहाए ही सही!
कभी अपनी नींदों से जग कर आना मेरे साथ,
तुम्हें देख कर अमलतास मुस्कुरा उठेगा। 
हां सच! 


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