कुछ ज़ख्म ऐसे भी होते हैं
जो रिसते हैं, सूखते हैं और
पपड़ी बन उड़ भी जाते हैं
मगर उस पपड़ी के नीचे होता है
वही रिसता ज़ख्म
जो फिर सूखेगा
मगर क्या जाने कब भरेगा
शायद कभी नहीं....
मेरे होठों के किनारे भी
एक ऐसा ही ज़ख्म है
तब से जब से तुमने अपने होठों से
कोने में लगी शहद साफ की थी
कहने को तो ज़ख्म है मगर
लुत्फ वो अब भी शहद का ही देता है
होंठ भींचूं तो अब भी ज़ायका
ज़बां पर महसूस करती हूँ ।
तुम्हारा तो पता नहीं लेकिन
इस ज़ख्म से इश्क सा हो गया है ।

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