Thursday, September 13, 2012

नौकरी





अरी नौकरी बड़ी नौकरी खरी नौकरी 
तू कैसे झट से मिल जाती है 
आजू बाजू वालों को
और मैं लपकूं झपटूं तुझको तो भी
क्यूँ हाथ मेरे न आती है री 
अरी नौकरी बड़ी नौकरी खरी नौकरी

मैं रातों में चाँद के आलों में
मोम जला कर पढ़ा किया
लालटेन की मिक्सी में मैं
किताब घोट कर पिया किया
फिर क्यूँ मखमल के जादों पे तू 
वारी न्यारी जाती है री
अरी नौकरी बड़ी नौकरी खरी नौकरी

एक ही शर्ट को घिस घिस चमकाके
 मैंने इस्त्रियाँ उनपे चलवाई 
टूटे जूते को कितनी दफा मैंने
मोची से सुईयां चुभवाई
कंघी करके बाबू बनके तेरे दर पर मैं आया
पर तूने माँ के लाल को देखा
मुझे एक नज़र न दिखलाई
बता री नौकरी सूझ बूझ क्या
लाला के घर गिरवी रख दी थी
या फिर चंद रुपईए खातिर
अकल क्या बेच खाई थी री 
 अरी नौकरी बड़ी नौकरी खरी नौकरी 

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