मेरी आँखों में दरारें पड़ गयी हैं..
इतनी भीचीं हैं..
कि देखा ही नही जाता दिखाई जी भी देता है..
कही उलझा हुआ है वो.. पैरहन के समंदर में..
कि हाथों में गुंचों की जहग खंजर ही मिलते हैं..
हमेशा लाल रंग में मिलते हैं .. ओ नीला करते फिरते हैं..
ये इंसानों को लेके से हर नये दिन . बकरीद करते हैं..
नयी तारों के किस सितान में नये ये गुल भटकते हैं..
ज़मीं ओ आसमा मिल के तड़प्ते हैं और रोते हैं
जहाँ तक ये नज़र जाए
मैं डर के भींच लेता हूँ.
जो होता है ज़मीं में मेरी आँखों में भी होता है..
कि देखा ही नही जाता है दिखाई जो भी देता है

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