Sunday, April 17, 2011

दरारें




मेरी आँखों में दरारें पड़ गयी हैं..
इतनी भीचीं हैं..
कि देखा ही नही जाता दिखाई जी भी देता है..
कही पे जिस्म तरसता है पैरहन को
कही उलझा हुआ है वो.. पैरहन के समंदर में..
दिलों की चाह सुलग कर आह बन बैठी है इस युग में..
कि हाथों में गुंचों की जहग खंजर ही मिलते हैं..
जिन हाथों में सुकून मिलना था रूह को वो ही रंगीन हाथ..
हमेशा लाल रंग में मिलते हैं .. नीला करते फिरते  हैं..
नयी ये क़ौम कैसी है.. नये ये लोग कैसे हैं..
ये इंसानों को लेके से हर नये दिन .बकरीद करते हैं..
कहाँ कंचे गये हैं और कहाँ गिल्ली गयी इनकी..
नयी तारों के किस  सितान में नये ये गुल भटकते हैं..
मेरा दावा है ये सैलाब  तूफान यूँ नही होते..
ज़मीं  आसमा मिल के तड़प्ते हैं और रोते हैं
कहाँ देखूं मैं क्या देखूं..
जहाँ तक ये नज़र जाए
धुआँ दिखता है मुझको और ... कायामात का समा लगता है...
मैं डर के  भींच लेता हूँ.
ये आँखें जलती रहती हैं..
जो होता है ज़मीं में मेरी आँखों में भी होता है..
ये आँखें इतनी भींचीं है कि दरारें पड़ गयी इनमें
कि देखा ही नही जाता है दिखाई जो भी देता है

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